नई दिल्ली: देश के प्रशासनिक ढांचे को लेकर एक बड़ी चेतावनी सामने आ रही है। केंद्र सरकार द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) के करीब 1300 और आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) के 605 पद वर्तमान में खाली पड़े हैं। यह आंकड़ा 1 जनवरी 2025 तक की स्थिति को दर्शाता है और साफ दिखाता है कि सरकारें कानून‑व्यवस्था, योजना क्रियान्वयन और प्रशासनिक निर्णयों में कम अधिकारियों के हाथों चल रही हैं।
विभिन्न राज्यों में इन अखिल भारतीय सेवाओं की कमी अलग‑अलग है। ओडिशा में आईएएस के 63 और मध्यप्रदेश में आईपीएस के 48 पद रिक्त होने की बात सामने आई है, जो कानून‑व्यवस्था की निगरानी और राज्य स्तरीय निर्णयों की गति पर दबाव डाल सकती है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इतनी बड़ी रिक्ति से प्रशासनिक दक्षता कमजोर हो रही है, जिससे योजनाओं के लाभ समय पर लोगों तक नहीं पहुंच पाते और जमीनी स्तर की निगरानी भी कमजोर पड़ रही है।
अखिल भारतीय सेवाओं के कुल स्वीकृत पदों की संख्या हजारों में है, लेकिन खाली पदों की बड़ी संख्या के कारण कार्यरत अधिकारियों पर जिम्मेदारी बढ़ गई है। कई राज्यों में एक ही अधिकारी दो‑दो पदों पर कामकाज देख रहा है, जिससे थकान, गलतियां और नीतिगत देरी की संभावना बढ़ जाती है।
हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि इन रिक्तियों को पूरा करने के लिए यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा के जरिए हर साल नियमित भर्ती चल रही है। पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों नए आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति हुई है, लेकिन फिर भी हर रिक्ति भरने में देर लग रही है। अब सवाल उठ रहा है कि वर्तमान भर्ती प्रक्रिया इतनी बड़ी कमी को समय रहते कम कर पाएगी या नहीं। यदि नहीं, तो क्या राज्य और केंद्र के बीच अधिकारियों के आवंटन और काडर नियमों में बदलाव की जरूरत होगी।

