नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा लाया गया अर्धसैनिक बलों में भर्ती और प्रमोशन से जुड़ा नया विधेयक अभी‑तक सुरक्षा बलों के मोर्चे पर तनाव बढ़ाने वाला मुद्दा बन चुका है। यह बिल केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) में उच्च पदों पर नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया में बदलाव का प्रावधान रखता है। सरकार का दावा है कि इससे बलों के भीतर प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और विभिन्न संगठनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा।
लेकिन विधेयक पर अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों और जवानों ने खुलकर ऐतराज़ जताया है। उनका तर्क है कि नए प्रावधानों से पदोन्नति में असमानता और बाहरी अधिकारियों की प्राथमिकता बढ़ेगी, जिससे उन कर्मियों के अवसर खतरे में पड़ जाएंगे, जो दशकों से सीमा, आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा जैसे कठिन मोर्चों पर तैनात रहे हैं। कई कर्मचारी संगठनों का डर है कि आंतरिक मनोबल टूटेगा और आत्मबल कमजोर होगा, जो सुरक्षा ऑपरेशनों की कार्यक्षमता को सीधे प्रभावित कर सकता है।
इस बात की परछाई अब सैन्य बलों के कुछ वर्गों में भी दिख रही है, जहां चिंता जताई जा रही है कि सुरक्षा बलों की संरचना और कार्य‑संस्कृति को भलीभांति समझे बिना लाए गए बदलाव भविष्य में ऑपरेशनल चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं। विपक्षी दलों ने संसद में बिल का सख्त विरोध किया और इसे प्रवर समिति को भेजकर पुनर्विचार की मांग की। उनका मानना है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक संवाद, कंसल्टेशन और विशेषज्ञ रिपोर्ट के बिना कोई रास्ता तय नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार की तरफ से कहा गया है कि सभी सुझावों पर विचार किया जाएगा, लेकिन फिर भी बलों के भीतर बढ़ती असंतोष की भावना ने इस विधेयक को राजनीतिक और संस्थागत दोनों तरफ विवाद का केंद्र बना दिया है। अब सवाल यह है कि क्या “प्रशासनिक दक्षता” के नाम पर लाए गए निर्णय सुरक्षा बलों के अंदरूनी विश्वास को तोड़ कर लिए जाएंगे या पर्याप्त परामर्श के बाद एक संतुलित समाधान निकलेगा।

