उपेक्षा का शिकार चंदेलों के कुलदेवता मणिदेव मंदिर का अस्तित्व संकट में

मणिदेव मंदिर

महोबा: उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में चंदेलकालीन गौरव की अमूल्य निशानियां देखरेख के अभाव में आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। महोबा में आठवीं-नौवीं शताब्दी से जुड़ा चंदेल राजाओं के कुलदेवता मणिदेव मंदिर भी ऐसी ही उपेक्षित धरोहरों में शामिल है। मंदिर की जर्जर होती दीवारें, उन पर जमी काई और मंदिर तक पहुंचने के लिए समुचित मार्ग का अभाव इसकी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहा है।

चंदेल वंश के कुलदेवता का पौराणिक महत्व

स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार मनिया देव का मूल नाम मणि देव था, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर मनियां देव हो गया। मान्यता है कि मणिदेव नागलोक के राजा थे और उन्होंने चंदेल वंश के प्रथम नरेश चंद्रवर्मन उर्फ नान्नुक को वह दिव्य मणि प्रदान की थी, जिसके स्पर्श से लोहा सोना बन जाता था। इसी मान्यता से आगे चलकर इसे पारस मणि या पारस पत्थर से जोड़ा गया। इतिहासकार बताते हैं कि मणिदेव का एक प्रमुख स्थान मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में स्थित अजयगढ़ क्षेत्र में था। बाद में चंदेल नरेश परमाल ने मणिदेव की प्रतिमा यहां लाकर विधि-विधान से स्थापित कराई।

कहा जाता है कि मदनसागर झील के किनारे राजा परमाल का भव्य महल था और मणिदेव का मंदिर भी कभी उसी महल परिसर का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। चंदेल इतिहास के गौरवशाली अध्यायों में राजा परमाल और उनके वीर सेनापति आल्हा-ऊदल का विशेष स्थान रहा है। जनश्रुतियों के अनुसार युद्धभूमि में जाने से पहले वीर आल्हा-ऊदल राजा परमाल से अनुमति लेने के उपरांत कुलदेवता मणिदेव का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करते थे। आल्हा-ऊदल ने अपने शौर्य से 52 युद्धों में विजय हासिल की थी। राजा परमाल ने लंबे समय तक चंदेल सत्ता का नेतृत्व किया और उनके शासनकाल में महोबा चंदेल वैभव के शिखर पर पहुंचा।

मुगल काल से शुरू हुई उपेक्षा की कहानी

बाद के शासकों के समय चंदेल सत्ता कमजोर होती गई और धीरे-धीरे उसका पराभव शुरू हो गया। चंदेल साम्राज्य के पतन और बाद के राजनीतिक बदलावों के साथ मणिदेव मंदिर भी उपेक्षा का शिकार होता चला गया। मुगल काल में मंदिर की स्थिति खराब हुई और आजादी के बाद भी इस ऐतिहासिक धरोहर को वह संरक्षण नहीं मिल सका जिसकी उसे जरूरत थी। वर्तमान में मंदिर की दीवारों पर मोटी काई जमी हुई है। मंदिर तक पहुंचने के लिए समुचित रास्ता नहीं होने के कारण श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही भी बेहद सीमित है। यही वजह है कि महोबा आने वाले अधिकांश लोग इस ऐतिहासिक स्थल से अनजान रह जाते हैं।

व्यक्तिगत प्रयासों के सहारे चल रही पूजा-अर्चना

सामाजिक कार्यकर्ता तारा पाटकार कहते हैं कि मणि देव मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित घोषित किया गया है लेकिन संरक्षण के नाम पर वहां धरातल पर कुछ भी नहीं हुआ। महंगाई के इस दौर में तमाम कठिनाइयों के बावजूद संजय शर्मा नामक व्यक्ति फिलहाल मंदिर की देखरेख में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उनकी कोशिशों से मंदिर की परंपरा और पूजा-अर्चना किसी तरह जारी है, लेकिन इतनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए केवल व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं।

महोबा का प्रसिद्ध कजली महोत्सव नजदीक है। ऐसे समय में जब देश-दुनिया से लोग महोबा के इतिहास और संस्कृति को जानने के लिए पहुंचते हैं, चंदेलों के कुलदेवता मणिदेव का उपेक्षित मंदिर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि इस मंदिर का जीर्णोद्धार, साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था और पहुंच मार्ग विकसित किया जाए तो यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और पर्यटन केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।

प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से उम्मीद

सामाजिक कार्यकत्री सरस्वती वर्मा कहती हैं कि महोबा की पहचान केवल आल्हा-ऊदल की वीरगाथाओं और चंदेलकालीन स्मारकों से नहीं, बल्कि उन अनगिनत धरोहरों से भी है जो आज संरक्षण की बाट जोह रही हैं। मणिदेव मंदिर उन्हीं धरोहरों में से एक है। जरूरत है कि जिला प्रशासन और क्षेत्र के जनप्रतिनिधि इसकी सुध लें, ताकि आने वाली पीढ़ियां चंदेलों के इस गौरवशाली इतिहास को केवल किताबों में नहीं, बल्कि जीवंत विरासत के रूप में देख सकें। पुरातत्व विभाग के आंकड़ों के अनुसार बुंदेलखंड क्षेत्र में चंदेलकाल के 300 से अधिक स्मारक हैं जिनमें से अधिकांश उपेक्षा के शिकार हैं। चंदेल वंश के स्थापत्य कला के नमूने खजुराहो के अलावा महोबा, कालिंजर और अजयगढ़ में भी बिखरे पड़े हैं।

स्थानीय निवासियों का मानना है कि यदि मणिदेव मंदिर का समुचित विकास किया जाए तो यह धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है। इससे न केवल मंदिर का संरक्षण सुनिश्चित होगा बल्कि क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार मंदिर की वास्तुकला चंदेल स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है जिसका अध्ययन शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

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