नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार रॉकेट की रफ्तार से ऊपर चढ़ रही है। ब्रेंट क्रूड आज 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी 105 डॉलर प्रति बैरल के काफी करीब पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमत में आई इस जोरदार तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका बन गई है।
कच्चे तेल की कीमत का रुपये और शेयर बाजार पर असर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सीधे सैन्य संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट में ऑयल टैंकर्स पर हुए हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल पिछले चार महीने के सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि एक प्रमुख ऑयल इंपोर्टर देश होने की वजह से कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी का सीधा असर शेयर बाजार, भारतीय मुद्रा रुपये की कीमत और घरेलू बाजार पर नजर आने लगा है।
टीएनवी फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ तारकेश्वर नाथ वैष्णव का कहना है कि कच्चे तेल के महंगे होने का सबसे पहला और बड़ा झटका भारतीय मुद्रा को लगा है। ऑयल इंपोर्ट बिल का भुगतान करने के लिए भारतीय तेल कंपनियों को डॉलर की मांग में भारी बढ़ोतरी करना पड़ा है। डॉलर की मांग में आई तेजी के कारण डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया रिकॉर्ड कमजोरी के साथ 95.80 के स्तर तक गिर गया।
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक लगातार अपने विदेशी मुद्रा भंडार से मुद्रा बाजार में डॉलर जारी करके रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यदि क्रूड की कीमत इसी स्तर पर बनी रहीं, तो रुपये पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है। बड़ी बात तो ये है कि अगर रिजर्व बैंक ने मुद्रा बाजार में डॉलर का प्रवाह ज्यादा बढ़ाया तो इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है।
शेयर बाजार में बिकवाली का दबाव
वैष्णव का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से बने तेल संकट का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ साफ नजर आ रहा है। उच्च लागत और मार्जिन घटने के डर से कई प्रमुख सेक्टर्स में जबरदस्त बिकवाली का दबाव बना हुआ है। आज भी बीएसई का सेंसेक्स इंट्रा-डे में 740 अंक से अधिक की गिरावट का शिकार हो गया था। बाद में खरीदारों ने लिवाली का जोर बनाकर बाजार की स्थिति को कुछ हद तक सहारा भी दिया। हालांकि कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी के कारण ऑयल एंड गैस सेक्टर के शेयरों को सीधा फायदा भी मिल रहा है।
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और एविएशन सेक्टर पर मार
इसी तरह खुराना सिक्योरिटीज एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ रविचंदर खुराना का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी से देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली हैं। इसकी वजह से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और सीएनजी, पीएनजी और एलपीजी के भाव में बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इसी तरह कच्चे तेल की कीमत में होने वाली बढ़ोतरी हवाई जहाज के ईंधन के रूप में इस्तेमाल वाले एयर टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) को और महंगा कर सकती है, जिसका निगेटिव असर पहले से ही दबाव का सामना कर रहे देश के एवियेशन सेक्टर पर पड़ सकता है।
पेंट, प्लास्टिक और रिन्यूएबल एनर्जी पर प्रभाव
एक्सपर्ट्स का मानना है कि कच्चे तेल की कीमत में हुई बढ़ोतरी से पेंट और प्लास्टिक उद्योग पर दोहरी मार पड़ सकती है। इस सेक्टर में क्रूड ऑयल ही सबसे प्रमुख रॉ मटेरियल होता है। तेल की कीमतें बढ़ने से इनके प्रॉफिट मार्जिन में जबरदस्त गिरावट आ सकती है। ऐसी स्थिति में इन सेक्टर्स में काम करने वाली कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स की कीमत में बढ़ोतरी कर सकती हैं।
रविचंदर खुराना का कहना है कि एक ओर तो महंगाई बढ़ने की आशंका बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर भारत में कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों के शेयरों में शानदार तेजी देखी जा सकती है। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल जैसे पारंपरिक ईंधन के महंगा होने से टाटा पावर और अडाणी ग्रीन जैसे रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) सेक्टर्स की ओर निवेशकों का आकर्षण तेजी से बढ़ सकता है। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में यह उछाल वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
करंट अकाउंट डेफिसिट और जीडीपी पर खतरा
जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत का लंबे समय तक बना रहना भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट को बढ़ा सकता है। इसके साथ ही इसकी वजह से फिस्कल डेफिसिट टारगेट भी हिट हो सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत के कारण स्टॉक मार्केट से फॉरेन कैपिटल आउटफ्लो (विदेशी पूंजी की निकासी) और तेज हो सकता है। इसी तरह अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव के कारण सरकार को सब्सिडी, इंटरेस्ट रेट और रुपया-डॉलर एक्सचेंज रेट पर पड़ने वाले असर के बारे में कड़े फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत के लंबे समय तक 100 डॉलर या इससे ऊंचे स्तर पर बने रहने से महंगाई पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। इसकी वजह से माल ढुलाई बढ़ेगी, जो आखिरकार खुदरा महंगाई दर को बढ़ाने की एक बड़ी वजह बनेगी। माल ढुलाई के महंगा होने से सब्जियां, फल, दवाइयां और रोजमर्रा का सामान महंगा हो जाएगा, जिसके कारण आम आदमी का बजट बिगड़ जाएगा। इसके साथ ही करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने से भारत की जीडीपी विकास दर की रफ्तार भी कुछ समय के धीमी पड़ सकती है।

