यूपीआई से डिजिटल पेमेंट के बाद अब छोटे कारोबारियों के लिए लोन आसान हो सकता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, डिजिटल ट्रांजैक्शन, जीएसटी और कैश फ्लो डेटा से बेहतर क्रेडिट असेसमेंट संभव है.
भारत में UPI ने जिस तेजी से आम लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों को बदला है, शायद ही किसी अन्य फाइनेंशियल इनोवेशन ने इतने कम समय में ऐसा प्रभाव डाला हो. चाय की दुकान से लेकर बड़े रिटेल आउटलेट तक QR Code आज पेमेंट का सामान्य जरिया बन चुका है. इसी बीच UPI के कुछ मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर शुरू हुई नई बहस ने डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत, सस्टेनेबिलिटी और फाइनेंशियल इंक्लूजन से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने ला दिए हैं. इसी बदलते बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट लेंडस्कप पर हमने बात की डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी से, जो JNU के अटल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट (ABVSME ) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनके प्रमुख शैक्षणिक क्षेत्र बैंकिंग, लेखा, वित्त और विलय और अधिग्रहण हैं. उन्होंने BHU से अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट और बैंकिंग मर्जर पर PhD की है और UGC की PDF फैलोश्पि भी प्राप्त की.उनके एक शोध कार्य को वर्ल्ड बैंक ने इंडियन इकोनॉमी से संबंधित रिफ्रेस मैटेरियल में साईट (उद्धृत) किया है. उनके PhD Thesis को पूर्व RBI Governor और भारत में Banking Reforms के जनक कहे जाने वाले M. Narasimham से भी सराहना मिली थी. उन्होंने बैंक मर्जर से जुड़े पॉलिसी इश्यू पर मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस को भी सुझाव दिए हैं.
वे बैंकिंग, वित्त, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और उच्च शिक्षा पर राष्ट्रीय मीडिया में नियमित रूप से लेखन और टिप्पणी करते रहे हैं. बैंक मर्जर और कंसोलिडशन पर उनका रिसर्च उस दौर से है जब भारत में बड़े पैमाने पर पब्लिक सेक्टर बैंक मर्जर अभी पॉलिसी एजेंडा के केंद्र में नहीं आए थे.
वर्तमान UPI बहस और भारतीय बैंकिंग के भविष्य पर उनसे बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: UPI के कुछ merchant transactions पर MDR की चर्चा के बाद इसे कहीं कहीं UPI tax भी कहा जा रहा है. आम व्यक्ति इसे कैसे समझे?
उत्तर: सबसे पहले MDR और Tax के बीच अंतर समझना जरूरी है. Merchant Discount Rate मूल रूप से payment processing ecosystem से जुड़ा charge है. इसे सीधे Government tax कहना तकनीकी रूप से सही नहीं है. लेकिन सामान्य उपभोक्ता के नजरिए से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय तक फाइनेंशियल सस्टेनेबल कैसे बनाया जाए. बैंक, पेमेंट, एप्लीकेशन, टेक्नोलॉजी, टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर, साइबर सिक्योरिटी सिस्टम और शिकायत निवारण की अपनी लागत होती है.
जीरो कॉस्ट मॉडल ने भारत में UPI adoption को बहुत तेजी से बढ़ाया. अब जैसे जैसे सिस्टम का scale बढ़ रहा है, स्टेबिलिटी का प्रश्न भी सामने आ रहा है. नीति की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि ईकोसिस्टम फाइनेशियल सस्टेन भी रहे और फाइनेंशियल इंक्ल्यूसन भी कमजोर न हो.
प्रश्न 2: यदि merchant को MDR देना पड़े तो क्या अंततः उसका भार consumer पर नहीं आएगा? क्या cash की ओर वापसी का खतरा भी हो सकता है?
उत्तर: इकोनॉमी में किसी भी अतिरिक्त बिजनेस कॉस्ट का फाइनल इम्पैक्ट समझना जरूरी होता है. मर्चेंट पर अगर कोई एक्स्ट्रा ट्रांजैक्शन कॉस्ट आती है, तो संभावना रहती है कि उसका कुछ हिस्सा प्राइस के जरिए कंज्यूमर तक पहुंच जाए. खासकर लो मार्जिन बिजनेस में छोटा सा परसेंटेज भी काफी मायने रख सकता है. इसलिए पॉलिसी डिजाइन में स्मॉल मर्चेंट्स और लो-वैल्यू ट्रांजैक्शन को खास प्रोटेक्शन देना जरूरी है.
प्रश्न 3: UPI की सफलता को क्या हम Financial Inclusion की सफलता भी मान सकते हैं?
उत्तर: यूपीआई फाइनेंशियल इंक्लूजन का बहुत पावरफुल माध्यम है, लेकिन दोनों को पूरी तरह एक जैसा मानना सही नहीं होगा. मेरे लिए फाइनेंशियल इंक्लूजन एक सीढ़ी की तरह है. पहला लेवल बैंक अकाउंट तक पहुंच है. दूसरा उस अकाउंट का रेगुलर यूज है. तीसरा अफोर्डेबल फॉर्मल क्रेडिट तक पहुंच है. चौथा इंश्योरेंस, पेंशन और इन्वेस्टमेंट जैसे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स तक पहुंच है. अंतिम लेवल फाइनेंशियल रेजिलिएंस है, यानी आर्थिक संकट की स्थिति में परिवार के पास पर्याप्त फाइनेंशियल प्रोटेक्शन हो.
यूपीआई ने ट्रांजैक्शन इंक्लूजन को असाधारण रूप से बढ़ाया है. लेकिन अब अगली चुनौती पेमेंट इंक्लूजन से क्रेडिट इंक्लूजन की ओर बढ़ने की है. अगर कोई छोटा दुकानदार रोजाना सैकड़ों डिजिटल ट्रांजैक्शन कर रहा है, लेकिन जरूरत पड़ने पर उसे रीजनएबल इंटरेस्ट रेट पर वर्किंग कैपिटल लोन नहीं मिल रहा, तो फाइनेंशियल इंक्लूजन अभी अधूरा है.
प्रश्न 4: UPI और digital transaction data क्या MSMEs तथा छोटे कारोबारियों की credit problem को हल करने में मदद कर सकते हैं?
उत्तर: मेरे विचार से यही यूपीआई इकोसिस्टम की अगली बड़ी इकोनॉमिक अपॉर्च्युनिटी हो सकती है. एमएसएमई लेंडिंग की एक पुरानी समस्या इनफॉर्मेशन असिमेट्री है. बहुत से छोटे बिजनेस इकोनॉमिकली वायबल होते हैं, लेकिन उनके पास ट्रेडिशनल कोलैटरल, लंबी क्रेडिट हिस्ट्री या बहुत मजबूत फॉर्मल फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स नहीं होते.
अगर कोई छोटा बिजनेस लगातार डिजिटल ट्रांजैक्शन कर रहा है, तो उसके कैश फ्लो और बिजनेस एक्टिविटी के बारे में यूजफुल फाइनेंशियल इंफॉर्मेशन उपलब्ध हो सकती है. यूपीआई ट्रांजैक्शन पैटर्न, जीएसटी डेटा, अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क और कैश फ्लो बेस्ड लेंडिंग का जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो क्रेडिट असेसमेंट की क्वालिटी बेहतर हो सकती है.
इससे अच्छे छोटे बिजनेस को सिर्फ कोलैटरल की कमी के कारण फॉर्मल क्रेडिट से बाहर रहने की समस्या कम की जा सकती है. लेकिन यहां डेटा प्राइवेसी और इनफॉर्म्ड कंसेंट बेहद महत्वपूर्ण हैं. किसी व्यक्ति या बिजनेस का ट्रांजैक्शन डेटा उसके फाइनेंशियल बिहेवियर का संवेदनशील हिस्सा है. टेक्नोलॉजी का उद्देश्य फाइनेंशियल इंक्लूजन बढ़ाना होना चाहिए, सर्विलांस नहीं.
प्रश्न 5: अगले चरण में भारत को UPI और Banking के क्षेत्र में किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए?
उत्तर: भारत ने दुनिया के सामने यह स्थापित किया है कि बहुत बड़ी पॉपुलेशन के लिए लो-कॉस्ट और रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जा सकता है. अब चुनौती यूपीआई की सेकंड जनरेशन तैयार करने की है. मेरे अनुसार अगला फेज सिर्फ डिजिटल इंडिया नहीं, बल्कि ट्रस्टेड डिजिटल फाइनेंस होना चाहिए.
यूपीआई इकोसिस्टम को फाइनेंशियली सस्टेनेबल बनाना जरूरी है, लेकिन सामान्य कंज्यूमर और छोटे मर्चेंट को पॉलिसी के सेंटर में रखना होगा. साइबर सिक्योरिटी और फ्रॉड प्रोटेक्शन को लगातार मजबूत करना होगा. डिजिटल पेमेंट हिस्ट्री का जिम्मेदारी से इस्तेमाल फॉर्मल क्रेडिट एक्सेस बढ़ाने में किया जा सकता है.
खास तौर पर एमएसएमई, स्मॉल ट्रेडर्स, रूरल हाउसहोल्ड्स और फर्स्ट जनरेशन एंटरप्रेन्योर्स को फॉर्मल बैंकिंग सिस्टम से ज्यादा गहराई से जोड़ने की जरूरत है. साथ ही, एआई बेस्ड बैंकिंग बढ़ने के साथ एक्सप्लेनेबिलिटी, डेटा प्राइवेसी और अकाउंटेबिलिटी भी महत्वपूर्ण होंगी.

