अबू सालेम की समय पूर्व रिहाई खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने दिया झटका

अबू सालेम की समय पूर्व रिहाई

मुंबई: 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सालेम को समय से पहले जेल से बाहर आने की उम्मीद को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बड़ा झटका लगा है। अबू सालेम की समय पूर्व रिहाई की मांग को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है, जिसके साथ ही फिलहाल उसे जेल से राहत मिलने का रास्ता बंद हो गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सालेम की सजा में छूट की अपील को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती

अबू सालेम ने जेल में अच्छे आचरण और अब तक भुगती गई सजा का हवाला देते हुए समयपूर्व रिहाई की मांग की थी। उसने 28 फरवरी 2025 को इस संबंध में याचिका दाखिल की थी। उसका दावा था कि जेल में बिताई गई अवधि और अच्छे आचरण के आधार पर मिलने वाली सजा में छूट को जोड़ दिया जाए तो उसकी प्रभावी सजा पूरी हो चुकी है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद सालेम ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने भी उसकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया और उसे किसी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए केवल अच्छे व्यवहार के आधार पर रिहाई उचित नहीं है।

केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने किया विरोध

सालेम की रिहाई की मांग का केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार दोनों ने विरोध किया था। सरकार का कहना था कि सालेम की आपराधिक पृष्ठभूमि बेहद गंभीर है। उसके खिलाफ आतंकवाद, हत्या, हत्या की साजिश और जबरन वसूली जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामले हैं। ऐसे व्यक्ति को केवल जेल में अच्छे व्यवहार के आधार पर विशेष राहत देना उचित नहीं होगा। महाराष्ट्र के कारागृह विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक सुहास वरके की ओर से दाखिल हलफनामे में भी सालेम की आपराधिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया गया था। सरकार ने यह भी कहा था कि 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद सालेम भारत से फरार होकर विदेश चला गया था और लंबे समय तक कानून से बचता रहा।

पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के बाद भारत लाया गया

अबू सालेम को नवंबर 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के जरिए भारत लाया गया था। भारत और पुर्तगाल के बीच हुए प्रत्यर्पण समझौते के तहत सालेम का दावा था कि उसे 25 वर्ष से अधिक की सजा नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर उसने अदालत के सामने दलील दी थी कि भारत लाए जाने के बाद से वह करीब 20 वर्ष जेल में बिता चुका है। उसकी गणना के मुताबिक 25 वर्ष की अवधि 10 नवंबर 2030 को पूरी होगी। हालांकि, वह अच्छे आचरण और सजा में मिलने वाली संभावित छूट को आधार बनाकर इससे पहले ही रिहाई चाहता था। 1993 मुंबई बम धमाके के बाद फरार होने वाले सालेम को प्रत्यर्पण संधि की शर्तों के तहत ही भारत लाया जा सका था।

अबू सालेम की समय पूर्व रिहाई पर अदालतों का रुख

सरकारों की दलील थी कि सालेम के अपराधों की गंभीरता और उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि को देखते हुए उसे सजा में विशेष छूट का लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालतों ने भी उसके दावे को स्वीकार नहीं किया। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अबू सालेम को समयपूर्व रिहाई के मामले में फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। यानी 2030 से पहले रिहाई की उसकी कोशिश को बड़ा झटका लगा है, जबकि उसे प्रत्यर्पण समझौते से जुड़ी 25 वर्ष की अवधि पूरी होने तक जेल में रहना पड़ सकता है। इस फैसले से साफ हो गया है कि गंभीर अपराधों के दोषियों को सजा में ढील देना आसान नहीं होगा।

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