नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम अनिवार्य करने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। यह याचिका प्रख्यात गायक टी. एम. कृष्णा ने दाखिल की है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी पर तीखी बहस भी हुई।
वंदे मातरम अनिवार्य पर सुनवाई की मुख्य बातें
जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि राष्ट्रगीत में जोड़े गए चार अंतरे धार्मिक प्रकृति के हैं, इसलिए उनके गायन को अनिवार्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। इसके अलावा अपमान पर दंड के प्रावधान को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
टी. एम. कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े और डॉ. एस. मुरलीधर ने दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि सोचने या असहमति जताने का अर्थ नक्सली होना नहीं है। संविधान हर नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। धार्मिक सामग्री वाले अंतरे गाने के लिए बाध्य करना इस अधिकार का हनन है।
सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी और विवाद
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कानून नक्सलियों के हिसाब से नहीं बनाया जा सकता। इस पर डॉ. मुरलीधर ने कड़ी आपत्ति जताते हुए टिप्पणी को गैर-जरूरी और मर्यादाहीन बताया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से ऐसी भाषा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सॉलिसिटर जनरल ने अपनी बात पर कायम रहते हुए कहा कि उन्हें कानून के अनुसार चलना होता है।
अदालत की टिप्पणी
जस्टिस बागची ने हस्तक्षेप करते हुए संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक आरोपी व्यक्ति के भी संविधान के तहत समान अधिकार होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रगीत क्या हो, यह तय करना न्यायपालिका का काम नहीं है, लेकिन दंड के प्रावधान की वैधता पर सुनवाई होगी।
अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की प्रति सॉलिसिटर जनरल को सौंपते हुए उनसे विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। तब तक केंद्र को अपना पक्ष रखना होगा।
इस मामले पर संविधान विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि राष्ट्रगीत के सम्मान के लिए कानून बनाना राज्य का अधिकार है, जबकि अन्य इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण मानते हैं। वंदे मातरम का इतिहास बताता है कि इसके मूल दो अंतरे ही बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखे थे, बाद के अंतरे बाद में जोड़े गए।
अब सबकी निगाहें 12 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी हैं, जब केंद्र सरकार अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल करेगी।



